Tuesday, September 12, 2017

गढ़वाली एवं कुमाऊनी भाषाओ का आई.वी.आर IVR ( इंटरैक्टिव वाइस रिस्पांस ) - सोच(SOCH)संस्था का उत्तराखंड सरकार को एक महत्वपूर्ण सुझाव"

उत्तराखंड के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री माननीय श्री सतपाल महाराज जी  ने इस सुझाव को गंभीरता से लिया इसके लिए उनका बहुत-बहुत धन्यवाद |
"गढ़वाली-कुमाऊनी भाषाओ के प्रचार-प्रसार के लिए सोच(SOCH)संस्था का उत्तराखंड सरकार को एक महत्वपूर्ण सुझाव"
सेवा में ,
आदरणीय श्री सतपाल महाराज जी
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री
उत्तराखंड सरकार

विषय - उत्तराखंड में गढ़वाली एवं कुमाऊनी भाषाओ के आई.वी.आर ( इंटरैक्टिव वाइस रिस्पांस ) की शुरुवात |

महोदय,
चरण स्पर्श प्रणाम 
महाराज जी आपके गढ़वाली एवं कुमाऊनी भाषा को राज्य भाषाओ का दर्जा दिलाने के प्रयास को कौन नहीं जानता , औरआपका अपनी भाषाओ के प्रति प्रेम भी किसी से छिपा नहीं है |एक उत्तराखंडी होने के नाते ,आपकी तरह अपनी भाषाओ का और संस्कृति का प्रेमी होने के नाते ,इस उम्मीद से ये पत्र आपको लिख रहा हूँ की शायद अपनी भाषाओ के प्रचार -प्रसार के लिए आपको मेरा ये सुझाव जरूर पसंद आएगा , और मुझे लगता है की पूर्ण बहुमत वाली इस सरकार को ये पत्र लिखने का अच्छा अवसर है |
असल में कुछ दिन पहले एक दिन मैं दुबई से मुंबई अपने दोस्त को फोन कर रहा था लेकिन मेरे मित्र का फोन बंद था तो वंहा से कम्प्यूटर आई.वी.आर (इंटरैक्टिव वाइस रिस्पांस ) की  मराठी भाषा में आवाज़ सुनाई दी तो मस्तिष्क में एक विचार आया की  क्या हम हमारी गढ़वाली -कुमाऊनी भाषा का आई.वी.आर उत्तराखंड में नहीं कर सकते? बस इसी एक विचार को मन में रखकर आपको ये पत्र लिख रहा हूँ |


 लगभग हर एक राज्य के पास उनकी भाषाओ के आई.वी.आर ( इंटरैक्टिव वाइस रिस्पांस ) मौजूद हैं तो हमारे पास क्यों नहीं ? कितना सुखद एहसास होगा अगर हम उत्तराखंडवासी भी दूसरे छोर से फोन के बंद होने पर, व्यस्त होने पर या किसी अन्य कारण से अपनी भाषाओ का आई.वी.आर सुन सकेंगे | इसके साथ-साथ दूसरे राज्यों के लोग भी जब उत्तराखंड में फ़ोन करेंगे तो उन्हें कम से कम उन्हें हमारी भाषाओ का पता लगेगा | हमारी भाषा का प्रचार भी होगा और लोग हमारी भाषाओ के बारे में भी जानेंगे |जैसा की आप जानते हैं की उत्तराखंड का अधिकांश हिस्सा ग्रामीण है और इन ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग मोबाइल फ़ोन का उपयोग करते हैं और जिसमे कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हे हिंदी /अंग्रेजी समझने में समस्या होती है । कितना अच्छा होगा जब यही लोग किसी भी जानकारी को अपनी बोली-भाषा में समझ सकेंगे और इसी वजह से उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे युवक/युवतियों को भी रोजगार मिलेगा ।



गढ़वाली- कुमाउँनी भाषा में आई.वी. आर होने के फायदे:
1.       गढ़वाली - कुमाऊनी भाषाओ का प्रचार-प्रसार होगा |
2.       दूसरे राज्य के लोगो को हमारी भाषाओ के बारे में पता लगेगा |
3.       यह कदम गढ़वाली- कुमाऊनी को राज्य भाषा का दर्जा एवं संविधान के आठवे अनुसूची  में शामिल करने में सहायक सिद्ध होगा।
4.       ग्रामीण क्षेत्र में रह रहे लोगो को ( जो हिंदी/अंग्रेजी नहीं समझते) अपनी भाषा में जानकारिया प्राप्त करने में आसानी होगी ।
5.       मोबाईल कम्पनिया भी अपने ग्राहको अच्छी ग्राहक सेवा दे पाएंगी।
6.       ग्राहक जब ग्राहक सेवा अधिकारी से गढ़वाली या कुमाऊनी में बात करना चाहेंगे तो वो कर पाएंगे और इसके लिए इन दोनों भाषाओ में निपुण कर्मचारी ही नियुक्त होगा , जाहिर है जो की उत्तराखंड का रहने वाला ही कोई युवक/युवती होंगे ।
7.       उत्तराखंड के ग्रामीण युवाओ को भी रोजगार मिलेगा ।
8.       इसके लिए कुछ कॉल सेण्टर शायद पहाड़ो में भी खोले जा सकेंगे और पलायन पर भी रोक लगेगी ।






ये कदम शायद भविष्य में हमारी भाषाओ को राज्य भाषा का दर्जा एवं संविधान के आठवे अनुसूची  में शामिल करने लिए सहायक हो |शायद इस से एक नयी शुरुवात हो ,ये हमारी भाषाओ के लिए बड़े सम्मान की बात होगी, और ये कदम लाखो उत्तराखंडियों की मुख पर जरूर मुस्कान लाएगी |

आशा है आप मेरे इस विचार पर गौर करेंगे , आपके उत्तर की प्रतीक्षा में |प्रणाम |



धन्यवाद


दीपेंद्र सिंह नेगी "दीप"
सदस्य (सोच - "सोशल आर्गेनाइजेशन फॉर कनेक्टिंग हैप्पीनेस" उत्तराखंड)

Friday, July 14, 2017

मुख्यमंत्री उत्तराखंड को एक पत्र | पहाड़ो में सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी की शिक्षा का स्तर कैसे बढ़ाया जाय - कुछ सुझाव

सेवा में ,
आदरणीय श्री त्रिवेंद्र सिंह रावत जी
मुख्यमंत्री उत्तराखंड सरकार
देहरादून

विषय - पहाड़ो में सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी की शिक्षा का स्तर कैसे बढ़ाया जाय - कुछ सुझाव



महोदय ,
प्रणाम ,जैसा की आप जानते हैं की पहाड़ से पलायन एक बहुत बड़ी समस्या है , जिसके कई मुख्य कारण है जैसे की रोजगार की कमी , शिक्षा के स्तर कमी , और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव |पहाड़ के बच्चे बहुत ही परिश्रमी होते हैं , माता-पिता के साथ घर के काम में हाथ बांटने के साथ वो पढाई में भी तेज़ होते हैं लेकिन जब वो नौकरियों के लिए शहरों में जाते हैं तो आसानी से अच्छी नौकरी नहीं पाते जिसका मुख्य कारण अंग्रेजी भाषा के ज्ञान एवं उसको बोलने में आत्मविशास की कमी होता है | हम सब जानते ही है आज के युग में अंग्रेजी भाषा का ज्ञान होना कितना जरूरी है | हमें अपनी भाषाओ पर गर्व है लेकिन अंग्रज़ी भाषा आना भी अनिवार्य है |

अगर में अपने अनुभव से कहूं तो पहाड़ के सरकारी स्कूलों में पढाई तो अच्छी होती है लेकिन अंग्रेजी का स्तर उतना अच्छा नहीं है | माँ-बाप की नज़रो में भी अंग्रेजी का ज्ञान होना ही अच्छी पढाई समझा जाता है |अगर हमारे सरकारी स्कूल में भी इस बात पर ध्यान दिया जाय तो वो दिन दूर नहीं जब हमारे पहाड़ की प्रतिभाओ की पूरी दुनिया कायल होगी और बहुत ही छोटी उम्र में हमारे ये युवक -युवतिया देश-विदेश में अच्छे पदों पर सुशोभित होंगे|
इसके लिए बस सरकार के अलावा सरकारी स्कूल के शिक्षकों में कुछ अलग करने की जिद होनी चाइये | हम उत्तराखंड सरकार द्वारा "उन्नति " नाम के कार्यक्रम की सराहना करते हैं| उत्तराखंड सरकार का यह कार्य सराहनीय और काबिले तारीफ़ है |
मुझे लगता है जब सरकारी स्कूल और प्राइवेट स्कूल का या अंतर ख़तम हो जायेगा तब सभी लोग चाहेंगे की उनके बच्चे सरकारी स्कूल में ही पढ़े जंहा फीस भी कम होती है और जाहिर की इस वजह से पलायन पर रोक भी लगेगी , क्योंकि कई लोगो के पास रोजगार होता है, लेकिन बच्चो के शिक्षा और भविष्य को ध्यान में रख कर वो लोग शहरों की और चले जाते हैं |
उत्तराखंड से प्रेम और उत्तराखंडी होने के नाते होने के नाते सोच सोसाइटी कुछ सुझाव इस पहल (उन्नति ) में जोड़ना चाहते हैं और हमें आशा है की आपको ये सुझाव पसंद आएंगे |

• स्कूल सात में से छ: दिन खुले रहते हैं तो क्यों न पांच दिन अंग्रेजी के पाठ्यक्रम सम्बंधित पढाई हो और एक दिन सिर्फ अंग्रेजी की वार्तालाप सम्बंधित पढाई हो , जिसमे सिर्फ बच्चो द्वारा अंग्रेजी में वार्तालाप हो और शिक्षक उनका सहयोग करे|शिक्षक उनके अंदर की झिझक को दूर करे , बच्चो को अंग्रेजी में वार्तालाप के लिए प्रोत्साहित करे |
• बच्चे शुरू में गलत बोले या सही बोले इसे नज़रअंदाज़ करते हुवे शिक्षक सिर्फ इस बात पर ध्यान दे की बच्चे सिर्फ अंग्रेजी में ही बोले |
• धीरे धीरे नए -नए शब्दों को सिखाते हुवे शिक्षक वार्तालाप में नए शब्दों का उपयोग करवाए |
• हर सरकारी स्कूल में सुबह की प्रार्थना के साथ साथ , बारी बारी से हर दिन स्कूल का एक बच्चा घर से अंग्रेजी समाचार लिख कर लाये और उसे सुबह सबके सामने पढ़े, ये क्रम हर दिन का रहे | ये अभ्यास अंग्रेजी की कक्षा में भी किया जा सकता है |
• महीने में हर एक कक्षा के बच्चे को अंग्रेजी में किसी विषय के ऊपर लिखने को बोलें , ये कोई परीक्षा नहीं होगी लेकिन शिक्षक इन लेखो को जांच सकते हैं और बच्चो को प्रतिक्रिया दे सकते हैं |
• समय समय पर कुछ अच्छे बच्चे जो अंग्रेजी बोलने में निपुण है , उनके द्वारा अंग्रेजी का एक छोटा नाटक भी कराया जाय | और ये क्रम लगातार जारी रहे , हर बार नाटक करने वाले बच्चे अलग अलग हो ,जिसमे पिछले बार भाग लेने वाले प्रतिभागी बच्चे उनका सहयोग कर सकते हैं |
उपर्युक्त अभ्यास के अनुसरण से बच्चो को अंग्रेजी बोलने सिखने का एक सकारात्मक वातावरण मिलेगा और निश्चय ही समय के साथ-साथ हमारे सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर बहुत ऊपर पहुँच जायेगा |
पुनः हम उत्तराखंड सरकार के इस सराहनीय कदम की प्रशंसा करते हैं और इस पत्र के उत्तर की उम्मीद करते हैं |

धन्यवाद
दीपेंद्र सिंह नेगी "दीप "
सदस्य (सोच संस्था )

उत्तराखंड